भारत एक ऐसा देश है जहां महिलाओं को देवी के समान माना जाता है। आज भी ऐसी हजारों महिलाएं हैं जिनके नाम के अंत में 'देवी' अक्षर आता है। इसके बावजूद, भारत में पितृसत्ता उतनी ही प्रबल है जितनी दुनिया में कहीं और। महिलाएं बहुत लंबे समय तक अपने घरों की चारदीवारी तक ही सीमित रहीं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ महिलाएं इन सीमाओं को तोड़ने में कामयाब रहीं?
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में कई महिला स्वतंत्रता सेनानी थीं। देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने वाले गुमनाम नायकों का जब जिक्र होगा, तो बिशनी देवी साह को जरूर याद किया जाएगा। अल्मोड़ा की रहने वालीं बिशनी देवी उत्तराखंड की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी थीं और साथ ही आजादी की लड़ाई में जेल जाने वालीं वह पहली महिला भी थीं।
पुरुष प्रधान जगत में मैंने,
अपना लोहा मनवाया है।
तभी जगत की नज़रों में,
मैंने सम्मान कमाया है।।
बिशनी देवी साह:
बिशनी देवी साह का जन्म 12 अक्टूबर 1902 को वर्तमान उत्तराखंड के बागेश्वर में हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि वे, स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जेल जाने वाली, उत्तराखंड की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी थीं।
बिशनी देवी का शुरुआती जीवन मुसीबतों और पीड़ाओं से भरा रहा। वे चौथी कक्षा के बाद अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख सकी थीं। तेरह साल की उम्र में उनकी शादी कर दी गई थी और दुर्भाग्यवश सोलह साल की उम्र में ही वे विधवा हो गईं। विधवा होने के कारण उनके ससुराल और मायके, दोनों जगहों से उन्हें बहिष्कृत कर दिया गया। हालाँकि, इससे बिशनी देवी के हौसले में कोई कमी नहीं आई।
बिशनी देवी ने अपना जीवन स्वतंत्रता संग्राम और अन्य सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया था। उन्होंने अल्मोड़ा के नंदा देवी मंदिर में काफ़ी समय बिताया, जहाँ उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित बैठकों में सक्रिय रूप से भाग लिया। वे जेल जाने वाले प्रदर्शनकारियों को फूल दिया करती थीं और उनकी आरती करके उन्हें प्रोत्साहित किया करती थीं। उन्होंने जेल में बंद प्रदर्शनकारियों के परिवारों के लिए भी गुप्त तरीके से धन इकट्ठा किया।
मै अबला नादान नहीं हूँ,
दबी हुई पहचान नहीं हूँ।
रखती अंदर ख़ुद्दारी हूँ,
मै निडर नारी हूँ।।
कुमाऊंनी कवि गौर्दा के गीतों से ली प्रेरणा:
अल्मोड़ा के नंदा देवी मंदिर में आए दिन अंग्रेजों के अत्याचार को खत्म करने के लिए बैठकें हुआ करती थीं। इन बैठकों में बिशनी देवी भी जाया करती थी। बिशनी देवी आंदोलनकारियों को प्रोत्साहित करती, जेल जाते समय सम्मानित कर पूजा करती, आरती उतारतीं और फूल चढ़ाया करती थीं।
बिशनी देवी कुमाऊंनी कवि गिर्दा के गीतों को रात्रि जागरण में गाया करती थी। बिशनी देवी कुमाउनी कवि ‘गौर्दा’ से प्रेरित थीं, जिन्होंने छुआछूत और अंधविश्वास जैसे विषयों पर कविताएँ लिखीं और अपनी कविताओं पर आधारित गीत गाए। जैसे-जैसे समय बितता गया वैसे-वैसे बिशनी देवी के अंदर देशभक्ति की भावना भी बढती रही। 1929 से 1930 के बीच महिलाओं में स्वाधिनता संग्राम के प्रति जागृति व्यापक होती गयी। 1930 तक पहाड़ की महिलायें भी सीधे आन्दोलन में भाग लेने लगीं। इस बीच वह पल आ गया था जहाॅ से बिशनी को एक मुख्य भूमिका निभानी थी।
25 मई 1930 को अल्मोड़ा नगर पालिका पर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराने का फ़ैसला किया गया। स्वयंसेवकों के एक जुलूस, जिसमें महिलाएँ भी शामिल थीं, को गोरखा सैनिकों द्वारा रोक लिया गया। इस घटना के बाद हुए हमले में मोहनलाल जोशी और शांतिलाल त्रिवेदी जैसे नेता घायल हो गए थे। इस सब के बावजूद, महिलाओं ने बिश्नी देवी, दुर्गा देवी पंत, तुलसी देवी रावत आदि के नेतृत्व में फिर से संगठित होकर सफलतापूर्वक ध्वजारोहण किया। उसी साल, बिश्नी देवी साह को गिरफ़्तार करके अल्मोड़ा जेल में बंद कर दिया गया। जेल की दयनीय परिस्थितियाँ भी उनके हौसले को नहीं तोड़ पाईं।
अल्मोड़ा में रहने वाली, बैठकों में जाने लगी थी।
अकेली योद्धा ये, बदलाव बड़े लाने लगी थी।।
स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्रीय ध्वज फहराने लगी थी।
आज़ादी लाने की चिंगारी हर दिल में जगाने लगी थी।।
जेल में वह प्रचलित गीत की पंक्तियां दोहराती थी-
“जेल ना समझो बिरादर, जेल जाने के लिये,
कृष्ण का मंदिर है, प्रसाद पाने के लिए।”
खादी के प्रचार के साथ जारी रहा आंदोलन:
जेल से छूटने के बाद बिशनी देवी ने अपनी स्वतंत्रता-संग्राम संबंधित गतिविधियों को फिर से शुरू कर दिया। इस बीच, स्वदेशी आंदोलन धीमा पड़ने लगा, क्योंकि स्वदेशी वस्तुओं को वितरित करने के लिए स्वयंसेवकों की कमी थी। इस कारण, दुकानदार उन वस्तुओं की अत्यधिक कीमत वसूलने लगे और स्थानीय रूप से निर्मित उत्पाद भी आम आदमी की खरीदने की क्षमता से बाहर हो गए।
बिशनी देवी ने घर-घर जाकर चरखों को 5 रुपये में बेचने का फ़ैसला किया, जबकि बाज़ार में चरखे का दाम 10 रुपये था। उन्होंने महिलाओं को चरखा चलाना भी सिखाया और ऐसा करके उन्होंने खादी के प्रसार में मदद की।
अल्मोड़ा में हरगोविंद पंत के नेतृत्व में कांग्रेस समिति का गठन किया गया था। बिशनी देवी को समिति की महिला प्रबंधक के रूप में चुना गया। विजयलक्ष्मी पंडित जैसे प्रमुख नेता और अन्य समिति सदस्य, बिशनी देवी के अथक कार्यों से बहुत प्रभावित थे। उनका कार्यक्षेत्र अल्मोड़ा से बाहर भी बढ़ने लगा।
2 फरवरी, 1931 को बागेश्वर में महिलाओं का एक जुलूस निकला तो बिशनी देवी ने उन्हें बधाई दी। सेरा दुर्ग (बागेश्वर) में आधी नाली जमीन और 5 रुपये दान में दिये। वे आन्दोलनकारियों के लिये छुपकर धन जुटाने, सामग्री पहुंचाने तथा पत्रवाहक का कार्य भी करतीं थीं। राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रियता के कारण जुलाई 1933 में उन्हें गिरफ्तार कर फतेहगढ़ जेल भेज दिया गया। उन्हें 9 माह की सजा और 200 रुपये जुर्माना हुआ। जुर्माना न देने पर सजा और बढ़ाई गई।
वहां से रिहा होने के बाद 1934 में बागेश्वर मेले में धारा 144 लगी होने के बावजूद उन्होंने स्वदेशी प्रदर्शनी करवाई। उन्होंने व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लिया, शराब की दुकानों के सामने विरोध प्रदर्शन व धरने दिए, और विदेशी वस्तुओं एवं कपड़ों में सार्वजनिक रूप से आग लगाई।
“खद्दर की ही धोती पहने, और खद्दर का ही कुर्ता,
एक हाथ में खद्दर का झोला और दूजे में सुराज्यी तिरंगा।”
17 अप्रैल, 1940 को बिशनी देवी, नन्दा देवी मन्दिर के समीप खुलने वाले कताई केन्द्र की संचालिका बनीं। 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन में ब्रिटिश सरकार को बिशनी देवी ने आन्दोलनकारी महिला की भूमिका का एहसास कराया। पंडित जवाहरलाल नेहरु और आचार्य नरेन्द्र देव की अल्मोड़ा जेल से रिहाई के समय बिशनी देवी ने उनकी अगवानी की।
आखिरकार देश में चल रहे आंदोलन के बाद भारत को स्वतंत्र राष्ट घोषित कर दिया गया। 15 अगस्त, 1947 को जब लाल किले पर तिरंगा फहराया जा रहा था उस दौरान दिल्ली से 378 किलोमीटर दूर अल्मोड़ा में एक शोभा यात्रा की अगुवायी बिशनी देवी शाह कर रही थीं।
देश आजाद हुआ। स्वतंत्र राष्ट्र में जीने का जो सपना देखा था वो भी पूरा हो गया। लेकिन देश के लिए अपना सर्वस्व दान करने वाली बिशनी देवी शाह का आखिर समय काफी मुश्किलों भरा रहा। उनका अपना कोई न था।आर्थिक अभाव में उनका अन्तिम समय अत्यन्त कष्टपूर्ण स्थिति में बीता।आखिरकार गुमनामी के अंधेरे में साल 1974 में 73 वर्ष की आयु में बिश्नी देवी का निधन हो गया।
पहाड़ की इस मिट्टी ने ऐसे ही न जाने कितने सपूतों को पाला है, जिन्होनें विपरित परिस्थतियों के बावजूद कभी हार नहीं मानी ओर हमेशा पहाड़ की तरह अडिग रहे ओर अपना नाम हमेशा हमेशा के लिये इतिहास के किसी पन्ने पर या पहाड़ की इन फिजाओं में अमर कर दिया।






