देव भूमि उत्तराखंड इससे देखने और यहां घुमने हर साल लाखो देशी और विदेशी पर्यटक यहां आते हैं। इसे भारत का स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है। क्योंकि यहां की पहाड़ी और प्रकृति की खूबसूरती देखते ही बनती हैं।
जब कभी भारत में भुतहा या हॉन्टेड गांव की बात आती है तो देश के पहले दस गावों की सूची में आने वाला एक गांव उत्तराखंड का भी है। यहां हॉन्टेड का अर्थ किसी गांव के खाली होने से नहीं है बल्कि गांव में भूत आदि दिखने से है।
उत्तराखंड को हम देवभूमि के नाम से जानते हैं लेकिन इस देवभूमि में कई ऐसे स्थान हैं जिन्हें भूतों और राक्षसों का अड्डा कहा जाता है। स्वाला गांव उनमें से एक है।
स्वाला गांव, एक ऐसा नाम होना चाहिए जिसके बारे में आपने कभी नहीं सुना होगा। यह उत्तराखंड के चंपावत जिले में स्थित है।
1952 से पहले यह एक सामान्य गांव जैसा था जिसमें बहुत सारे लोग रहते थे लेकिन एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने इस गांव को भूतों का गांव बना दिया।
इस गांव के बारे में माना जाता है कि यहां आठ पीएसी के जवानों की आत्मा आज भी घुमती हैं। इन आत्माओं से बचने के लिये लोगों ने गांव छोड़ दिया।
यही वजह है कि ये गांव बिल्कुल खाली पड़ा है। इस गांव का हर घर वीरान है।
Swala Village – बस एक हादसे ने बदली इस गांव की पूरी तस्वीर:
एक बहुत ही अजीबोगरीब कहानी है जिसने इस गांव को भुतहा बना दिया।
इस गांव के लिए साल 1952 का एक काला दिन था जब गांव से बटालियन की पी.ए.सी जवनों की गाड़ी गुजर रही थी तब उस गाड़ी में 8 जवान सवार थे, इस दौरान जवानों के साथ एक घटना हुई, जिसके बाद पूरा गांव सुनसान पड़ा है।
1952 में सेना की एक बटालियन इस गांव से गुजर रही थी लेकिन दुर्भाग्य से उनका वाहन संतुलन खो बैठा और पहाड़ की एक बड़ी खाई में गिर गया। सेना के सभी लोग फंस गए और बुरी तरह घायल हो गए। कुछ ग्रामीणों ने वाहन को गिरते हुए देखा तो वे उस स्थान की ओर भागे लेकिन उनकी मदद करने के बजाय वे उनका सामान और सामान लेकर भागने लगे। सभी आठ सैनिक मदद के लिए चिल्लाते रहे लेकिन किसी ने उनकी मदद नहीं की।मदद न मिलने के कारण गाड़ी में फंसे आठों जवानों ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया।
इस घटना के कुछ समय बाद पुरे गांव में लोगों के साथ कुछ अजीब घटनाएं घटने लगी और पुरे गांव में जवानों की आत्माएं भटकने लगी। कई बार तो लोगों को लगता की उनके साथ कोई चल रहा है इस कारण गांव वालो ने आत्माओं से परेशान होकर गांव ही छोड़ने का फैसला लिया। गांव के लोगों के अनुसार, आज भी इस गांव में जवानों की आत्माएं भटकती है। यही कारण है की आज गांव में एक भी व्यक्ति नहीं रहता है। जिस वजह से यह 'स्वाला' गांव बिल्कुल सुनसान पड़ा है।
स्वाला गांव के बारे में क्या कहते हैं लोग?
कहते है उस घटना के बाद जवानों की आत्माएं उस गांव में भटकने लगी। इन जवानों की आत्माएं किसी को दिखाई तो नहीं देती थी मगर गांव में बहुत अजीब घटनाएं होने लगी। आत्माओं ने गांव में इतना कोहराम मचाया कि गांव वालों का जीना मुश्किल कर दिया था। लोग बीमार होने लगे आर्थिक संकट से झूझने लगे। गांव वालों की खुशियां मानों जैसे किसी ने छीन ली हों।
गाँव वालो को लगता था जैसे कोई और भी उनके साथ चल रहा है। लोगों का कहना है कि अगर वे गाँव के घर में रात बिताने की कोशिश करते हैं और अंधेरे में बाहर निकलते हैं, तो सिपाहियों की आत्मा उन्हें उसी स्थान पर घसीटने की कोशिश करती है जहाँ वे सभी मर गए। आज भी लोग इन जवानों को देखने का दावा करते हैं।
इन सब घटनाओं से तंग होकर एक दिन गांव वाले गांव छोड़ कर भाग गए। धीरे धीरे इस गांव के भुतहा होने की खबर आस पास भी फैलने लगी लगी। जिसके बाद किसी ने भी इस गांव में जाने की भी कोशिश नहीं की। इस गांव के कोसो दूर तक कोई इंसानी गांव नहीं बसा हुआ है। लोग कहते है कि गांव में जवानों की आत्माएं आज भी भटकती है, इसीलिए ये गांव वीरान पड़ा है।
इस कहानी से हट कर स्वाला गांव के मूल निवासियों की नई पीढ़ी का कहना है कि बस गिरने की घटना सही है लेकिन गांव के खाली होने का कारण कोई भूत न होकर गांव का विकास न होना है। मूलरुप से इस गांव के लोग भूत वाली सभी बातों को सिरे से करते हैं।
ग्रामीणों को हुआ गलती का एहसास:
कुछ समय बाद ग्रामीणों को गलती का एहसास हुआ और उन्होंने उसी स्थान पर जिस खाई में जवानों की गाड़ी गिरी थी, जवानों की आत्मा की शांति के लिये नवदुर्गा का मंदिर बनवाया। मगर फिर भी इस जगह पर रहना तो दूर जाना तक लोग पसंद नहीं करते हैं।
यह मंदिर मुख्य सड़क पर है और आज भी इस स्थान से गुजरने वाले सभी वाहन यहाँ एक क्षण के लिए रुकते हैं और अपना सिर झुका लेते हैं।
इसके साथ ही यहां पर मार्बल के पत्थर पर लिखा गया है कि 1952 में यहां पीएसी के जवानों की गाड़ी खाई में गिरी थी जिसमें आठ पीएसी के जवानों की मृत्यु हुई थी।
स्वाला गांव कैसे पहुंचे?
स्वाला गांव उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के चंपावत जिले में स्थित है। यह जिला मुख्यालय चंपावत से लगभग 17 किमी. की दुरी पर स्थित है।
स्वाला गांव सड़क नेटवर्क के माध्यम से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।
सड़क मार्ग द्वारा:
स्वाला गांव जिला मुख्यालय चंपावत से लगभग 17 किमी. की दुरी पर स्थित है। चंपावत उत्तराखंड के अधिकांश महत्वपूर्ण कस्बों और शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।
रेल द्वारा:
स्वाला गांव का निकटतम रेलवे स्टेशन 164 किमी दूर काठगोदाम में है।काठगोदाम भारत के प्रमुख स्थलों के साथ रेलवे नेटवर्क से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। काठगोदाम से स्वाला गांव के लिए टैक्सियाँ और बसें आसानी से उपलब्ध हैं।
वायु द्वारा:
स्वाला गांव जाने का सबसे अच्छा समय:
चंपावत जाने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से अप्रैल के बीच है। इन महीनों में यहां की यात्रा करना सबसे अच्छा और सुखद होता है।
सर्दी के मौसम में यहां का मौसम ठंडा होता है। सर्दियों के मौसम में आसपास की पहाड़ियों पर बर्फबारी के कारण यहां का तापमान बहुत नीचे चला जाता है। शीत ऋतु के ठंडे मौसम के कारण यहाँ ऊनी वस्त्रों की आवश्यकता पड़ती है।
बारिश के मौसम में भारी बारिश के कारण भूस्खलन की धमकी देने वाली भारी बारिश के कारण यहां की यात्रा करना थोड़ा मुश्किल होता है। यहाँ का तापमान सर्दियों के मौसम में 3°C से 10°C के बीच और गर्मी के मौसम में 15°C से 25°C के बीच रहता है।








