उत्तराखंड धार्मिक पर्यटन के लिहाज से बहुत समृद्ध है। हिमालय की ऊंची चोटियों से लेकर तराई तक अनेक प्रकार के मठ मंदिर श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। प्रदेश में हर साल लाखों श्रद्धालु व पर्यटक मानसिक शांति व छुट्टियों में इसका दर्शनलाभ लेते हैं। उत्तराखंड हिन्दुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है, यहाँ मौजूद मंदिरों का एक अलग ही महत्व है। उत्तराखंड में आपको थोड़ी-थोड़ी दूर में कई मंदिर देखने को मिल जायंगे। आज हम आपको ऐसे ही एक मंदिर के बारें में बताने जा रहे हैं। जहाँ भगवान सूर्य देव की स्तुति की जाती है।
वैसे तो देश में भगवान सूर्य के कई मंदिर मौजूद हैं। सूर्य देव के हर मंदिर में भगवान की मूर्ति विशेष पत्थर या धातु से बने हैं। आज एक ऐसे पुरातन सूर्य मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां भगवान सूर्य की मूर्ति किसी धातु या पत्थर से नहीं, बल्कि पेड़ की लकड़ी से बनी है। आइए जानते हैं इस अद्भुत सूर्य मंदिर के बारे में।
देवभूमि उत्तराखंड के कटारमल सूर्य मंदिर में भगवान सूर्य साक्षात विराजमान हैं। कटारमल सूर्य मंदिर के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर सूर्य को समर्पित भारत का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। इस पोस्ट के माध्यम से हम आपको कटारमल सूर्य मंदिर की स्थापत्य कला, पौराणिक मान्यताएं और इस मंदिर से जुडी कुछ अहम जानकारी देंगे तो इस इस पोस्ट को अंत तक पढ़ें।
कटारमल सूर्य मंदिर (Katarmal Sun Temple):
देवभूमि उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के अधेली सुनार नामक गांव में भगवान सूर्य का कटारमल सूर्य मंदिर है। यह मंदिर अल्मोड़ा शहर से तकरीबन 16 किलोमीटर की दूरी पर समुद्र तल से 2116 मीटर की ऊंचाई पर है। यह सूर्य मंदिर कोणार्क के सूर्य मंदिर से भी 200 साल पुराना बताया जाता है।
यह सूर्य मन्दिर न सिर्फ़ समूचे कुमाऊँ मंडल का सबसे विशाल, ऊँचा और अनूठा मन्दिर है, बल्कि उड़ीसा के 'कोणार्क सूर्य मन्दिर' के बाद एकमात्र प्राचीन सूर्य मन्दिर भी है। 'भारतीय पुरातत्त्व विभाग' द्वारा इस मन्दिर को संरक्षित स्मारक घोषित किया जा चुका है। सूर्य देव प्रधान देवताओं की श्रेणी में आते हैं। वे समस्त सृष्टि के आधार स्वरूप हैं। संपूर्ण भारत में भगवान सूर्य देव की पूजा, अराधना बहुत श्रद्धा एवं भक्ति के साथ की जाती है।
कटारमल सूर्य मंदिर का निर्माण 6 ठीं से 9 वीं शताब्दी के बीच हुआ था। दरअसल इस मंदिर का निर्माण कत्यूरी राजवंश के राजा कटारमल ने करवाया था। मंदिर के संबंध में मान्यता है कि राजा कटारमल ने इसका निर्माण एक ही रात में करवाया था।
कटारमल सूर्य मंदिर का इतिहास:
सतयुग में उत्तराखण्ड की कन्दराओं में तप करने वाले ऋषि-मुनियों पर एक असुर अत्याचार कर रहा था। उस समय द्रोणगिरी कषायपर्वत और कंजार पर्वत के ऋषि मुनियों ने कौशिकी, जो अब कोसी नदी कहलाती है। इसके तट पर आकर सूर्य देव की स्तुति की थी। तब ऋषि मुनियों की प्रार्थना से प्रसन्न होकर उन्होंने अपने दिव्य तेज को एक वटशिला में स्थापित कर दिया। इसी वटशिला पर कत्यूरी राजवंश के शासक कटारमल ने बड़ादित्य नामक तीर्थ स्थान के रूप में इस सूर्य मन्दिर का निर्माण करवाया, जो अब कटारमल सूर्य मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध है।
इस सूर्य मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है। यह मंदिर कोणार्क के विश्वविख्यात सूर्य मंदिर से लगभग दो सौ वर्ष पुराना माना गया है। मंदिर नौवीं या ग्यारहवीं शताब्दी में निर्मित हुआ माना जाता है। इस मंदिर की स्थापना के विषय में विद्वानों में कई मतभेद हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इस मंदिर का जीर्णोद्धार समय-समय पर होता रहा है। यह सूर्य मंदिर सूर्य देवता को समर्पित है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कटरामल के एक राजा ने करवाया था। प्रारंभिक मध्ययुगीन काल में कुमाऊँ में कत्यूरी राजवंश का शासन था, जिन्होंने इस मंदिर के निर्माण में योगदान दिया था।
कटारमल मंदिर के मुख्य भवन का शिखर भाग खंडित है। मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण रातों रात किया गया, मगर जब प्रातः सूर्य निकलने लगा तो मुख्य मंदिर के शिखर का भाग छूट गया जिस कारण मुख्य मंदिर के शिखर भाग अधूरा छूट गया।
वहीँ एक अन्य मान्यता के अनुसार मंदिर के रख रखाव के अभाव के कारण शिखर भाग खंडित हो गया। वर्तमान में इस मंदिर की देखभाल भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा की जा रही है।
कटारमल सूर्य मंदिर की विशेषता:
देवदार और सनोबर के पेड़ों से घिरे अल्मोड़ा की पहाड़ियों में स्थित कटारमल का सूर्यमंदिर वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। मंदिर शानदार कलात्मक रूप से बने पत्थर और धातुकर्म और खूबसूरती से बनाये गए नक्काशी के खंभे और लकड़ियों के दरवाजे के लिए प्रसिद्ध है।
इस सूर्य मन्दिर को "बड़ आदित्य सूर्य मन्दिर" भी कहा जाता है। इस मन्दिर में भगवान आदित्य की मूर्ति किसी पत्थर अथवा धातु की नहीं अपितु बड़ के पेड़ की लकड़ी से बनी है। मन्दिर के गर्भगृह का प्रवेश द्वार भी उत्कीर्ण की हुई चंदन की लकड़ी का ही था, जो इस समय दिल्ली के 'राष्ट्रीय संग्रहालय' की दीर्घा में रखा हुआ है। पूर्व दिशा की ओर मुख वाले इस मन्दिर के बारे में माना जाता है कि के इसे मध्य काल में कत्यूरी वंशज राजा कटारमल ने बनवाया था, जो उस समय मध्य हिमालय में शासन करते थे। मुख्य मन्दिर की संरचना त्रिरथ है, जो वर्गाकार गर्भगृह के साथ नागर शैली के वक्र रेखी शिखर सहित निर्मित है। मन्दिर में पहुंचते ही इसकी विशालता और वास्तु शिल्प बरबस ही पर्यटकों का मन मोह लेते हैं।
इस परिसर में छोटे-बड़े मिलाकर कुल 45 मंदिर हैं। पहले इन मंदिरों में मूर्तियां रखी हुई थीं, जिनको अब गर्भ गृह में रखा गया है। बताया जाता है कि कई साल पहले मंदिर में चोरी हो गई थी, जिस वजह से अब सभी मूर्तियों को गर्भ गृह में रखा गया है।
इस मंदिर में साल में दो बार सूर्य की किरणें भगवान की मूर्ति पर पड़ती है। 22 अक्टूबर और 22 फरवरी को सुबह के समय यह देखने को मिलता है। मंदिर में सूर्य देव पद्मासन मुद्रा में बैठे हैं। कहा जाता है कि यहां श्रद्धा व भक्ति से मांगी गई हर इच्छा पूर्ण होती है। यहां पर श्रद्धालुओं का आवागमन वर्ष भर इस मंदिर में लगा रहता है। इसके अलावा यहां पर इतिहार से विद्यार्थी, वास्तुकला व प्रकृतिप्रेमियों का जमावड़ा विशेष रूप से लगा रहता है। कहा जाता है कि देवी-देवता यहां भगवान सूर्य की आराधना करते थे।
कटारमल सूर्य मंदिर कैसे जाएं ?
सड़क मार्ग: कटारमल मंदिर के सबसे नजदीक का क़स्बा कोसी है जो सड़क नेटवर्क के माध्यम से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। चूंकि उत्तराखंड में हवाई और रेल संपर्क सीमित है, सड़क नेटवर्क सबसे अच्छा और आसानी से उपलब्ध परिवहन विकल्प है। आप या तो कोसी के लिए ड्राइव कर सकते हैं या एक टैक्सी/टैक्सी को किराए के लिए दिल्ली या किसी भी दूसरे शहर कसे कोसी तक पहुंच सकते हैं। कटारमल कोसी से लगभग 1.5 कि०मी० की पैदल दूरी पर है।
हवाई मार्ग द्वारा: अल्मोड़ा के नजदीकी हवाई अड्डा, एक प्रसिद्ध कृषि विश्वविद्यालय पंतनगर में स्थित है, जो कटारमल के नजदीकी कस्बे कोसी से लगभग १४७ और अल्मोड़ा से लगभग 127 किलोमीटर दूर है।
रेल मार्ग द्वारा: निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम करीब 105 किलोमीटर दूर स्थित है। काठगोदाम रेलवे से सीधे दिल्ली भारत की राजधानी, लखनऊ उत्तर प्रदेश राज्य की राजधानी, देहरादून उत्तराखंड राज्य की राजधानी है।












