उत्तराखंड भारत का एक बहुत ही लोकप्रिय राज्य है जिसे “देवभूमि” के नाम से जाना जाता है। जिसका अर्थ होता “देवताओं की भूमि”। यह मुख्य रूप से अपने आकर्षक पर्यटन स्थलों और तीर्थ स्थल के लिए काफी ज्यादा प्रसिद्ध है।उत्तराखंड के आध्यात्मिक और धार्मिक वातावरण का आनंद लेने के लिए यहाँ पर दुनिया भारत से लोग आते हैं।
उत्तराखंड एक ऐसा राज्य है जो विभिन्न जातीय, जनजातीय समुदायों और यहां तक कि अप्रवासियों लोगों का घर है। यहां लोग कई भाषाओं जैसे कि हिंदी, भोटिया, गढ़वाली, कुमाउनी बोलते हैं, विभिन्न पारंपरिक कपड़े पहनते हैं। उत्तराखंड में मेले और त्यौहार जीवन का एक तरीका है जिन्हें लोगो द्वारा बड़े ही धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
उत्तराखंड के प्रमुख त्यौहार और मेले इस राज्य की संस्कृति और परम्पराओं को प्रदर्शित करने के साथ साथ पर्यटन में भी महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करते है और देश विदेश से भी बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करते है।
उत्तराखंड के प्रमुख त्यौहार/मेले:
उत्तराखंड के त्योहार बहुत ही विशिष्ट हैं जो विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों का मिश्रण हैं। तो आइये जानते हैं उत्तराखंड का प्रमुख त्योहारों के बारे में।
1. कुंभ का मेला (kumbha mela):
कुंभ मेला उत्तराखंड के सबसे प्रमुख त्योहारों में से एक है। कुम्भ का मेला उत्तराखंड का सबसे बड़ा मेला है जिसे हर बारह साल में एक बार हरिद्वार में आयोजित किया जाता है और तीन महीने तक चलता है। इस मेले को प्रयाग राज के नाम से भी जाना जाता है। कुम्भ के मेले में हिन्दू भक्तों की भीड़ हरिद्वार की पवित्र नदी में स्नान करने के लिए जमा होती है।
कुम्भ का मेला लगभग 2000 वर्षों से आयोजित किया जा रहा है। इस मेले की सबसे खास बात नागा साधुओं द्वारा निकाले जाना वाला जुलूस है। हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाले पर्यटक इस पवित्र मेले के दर्शन करने के साथ-साथ नदियों में स्नान करके मोक्ष की प्राप्ति करने आते है।
2. मकर संक्रांति (घुघुतिया त्यौहार):
मकर संक्रांति जनवरी के महीने में 14 या 15 तारीख को मनाया जाता है।हिन्दू महीने के अनुसार पौष शुक्ल पक्ष में मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है। यह एकमात्र ऐसा त्यौहार है जो कि हर साल एक ही तारीख पर आता है, वास्तव में यह पर्व सोलर कैलेंडर का पालन करता है। उत्तराखंड राज्य के कुमाऊं में मकर संक्रांति पर ‘घुघुतिया‘ के नाम एक त्योहार मनाया जाता है।इस दिन एक विशेष प्रकार का व्यंजन घुघुत बनाया जाता है। इस त्योहार की अपनी अलग ही पहचान है।
इस पर्व को उत्तरायणी पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। मकर संक्रांति पूरे भारतवर्ष और नेपाल में मुख्य फसल कटाई के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में एक दिन पहले 13 जनवरी को ही मनाया जाता है। इस दिन उत्सव के रूप में स्नान, दान आदि किया जाता है एवम् तिल और गुड के पकवान बांटे जाते है। भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में मकर संक्रांति के पर्व को अलग-अलग तरह से मनाया जाता है।
3. फूल संक्राति (फूलदेई):
उत्तराखंड की धरती पर ऋतुओं के अनुसार कई अनेक पर्व मनाए जाते हैं। यह पर्व हमारी संस्कृति को उजागर करते हैं, वहीं पहाड़ की परंपराओं को भी कायम रखे हुए हैं। इन्हीं खास पर्वो में शामिल “फुलदेई पर्व” उत्तराखंड में एक लोकपर्व है। उत्तराखंड में इस त्योहार की काफी मान्यता है। इस त्योहार को फूल सक्रांति भी कहते हैं, जिसका सीधा संबंध प्रकृति से है। इस समय चारों ओर छाई हरियाली और नए-नए प्रकार के खिले फूल प्रकृति की खूबसूरती में चार-चांद लगा देते है।
हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र महीने से ही नव वर्ष होता है और नववर्ष के स्वागत के लिए खेतो में सरसों खिलने लगती है और पेड़ो में फुल भी आने लग जाते है। उत्तराखंड में चैत्र मास की संक्रांति अर्थात पहले दिन से ही बसंत आगमन की खुशी में फूलों का त्योहार “फूलदेई” मनाया जाता है।
4. हरेला त्योहार (भिटौली):
उत्तराखंड भारत का एक ऐसा राज्य है जहाँ पर लोग हर मौसम में कोई न कोई त्यौहार मानते हैं। इसी तरह हरेला भी एक त्यौहार है जो कि बारिश के मौसम में या मानसून की शुरुआत में मनाया जाता है। हरेला त्यौहार श्रावण माह की पहली गते यानी जुलाई-अगस्त को मनाया जाता है। हरेले से कुछ दिन पहले हरियाली डाली जाती है व 1 गते को हरियाली ( हरेला ) को काटकर देवी देवताओं को चढ़ाते हैं। इस त्यौहार को लेकर पौराणिक कथा है कि यह भगवान शिव और पार्वती के विवाह समारोह के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान भक्त महेश्वर, गणेश जैसे देवताओं की मूर्तियाँ भी बनाते हैं।
5. घी-संक्राति (ओलगिया):
घी संक्रांति उत्तराखंड राज्य का एक और प्रमुख कृषि त्यौहार जिसे ओलगिया उत्सव के रूप में भी जाना जाता है। बता दे इस त्यौहार अगस्त के महीने में भदोई के पहले दिन मनाया जाता है। यह मूल रूप से एक ऐसा त्योहार है जो खेती के व्यवसाय में स्थानीय लोगों और परिवारों की कृतज्ञता का प्रतीक है।
भाद्रपद (भादो) महीने की संक्रांति जिसे सिंह संक्रांति भी कहते हैं। इस दिन सूर्य “सिंह राशि” में प्रवेश करता है और इसलिए इसे सिंह संक्रांति भी कहते हैं। उत्तराखंड में भाद्रपद संक्रांति को ही घी संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। यह त्यौहार भी हरेले की ही तरह ऋतु आधारित त्यौहार है, हरेला जिस तरह बीज को बोने और वर्षा ऋतू के आने के प्रतीक का त्यौहार है। वही “घी त्यार” अंकुरित हो चुकी फसल में बालिया के लग जाने पर मनाये जाने वाला त्यौहार है।
6. नंदा देवी राज जात यात्रा:
नंदा देवी राजजात यात्रा उत्तराखंड की ऐसी ऐतिहासिक धरोहर है, जो उत्तराखंड के सांस्कृतिक महक को पूरे भारत में बिखेरे हुए है व जनमानस को एक सूत्र में बांधती है। नंदा देवी राज जात यात्रा को ‘हिमालयन महाकुंभ’ के रूप में भी जाना जाता है। उत्तराखंड में जात का अर्थ होता है देव यात्रा अर्थात नंदा राजजात का अर्थ है राजराजेश्वरी नंदा देवी की यात्रा यह यात्रा देवभूमि में मानव और देवताओं के संबंध की अनूठी दास्तान है, यह यात्रा पहाड़ के कठोर जीवन का आईना है तो पहाड़ में ध्याणी (विवाहित बेटी/बहन) के संघर्षों की कहानी है, राज जात की शुरुआत सातवीं सदी के आसपास मानी जाती हैं। यह वह समय था जब उत्तराखंड में आदि गुरु शंकराचार्य का आगमन हुआ और उन्होंने देश के चारों कोनों पर चार मठों की स्थापना की थी।
यह बड़ी यात्रा मां नंदा को उनके ससुराल भेजने की यात्रा है मां नंदा को भगवान शिव की पत्नी माना जाता है और कैलाश हिमालय भगवान शिव का निवास स्थान है। यह मान्यता है एक बार मां नंदा अपने मां के यहाँ (मायके) आयी थी, लेकिन किन्ही कारणों से वहां 12 वर्ष तक ससुराल नहीं लौट सकी बाद में उन्हें आदर सत्कार के साथ ससुराल भेजा गया।
चमोली जिले में पट्टी चांदपुर और श्री गुरु क्षेत्र को मां नंदा का मायके और बधाण क्षेत्र को उनका ससुराल माना जाता है। यह ऐसी विश्व की सबसे लंबी पैदल यात्रा है और गढ़वाल-कुमाऊं की सांस्कृतिक विरासत श्रीनंदा राजजात अपने में कई रहस्य और रोमांच को संजोए हुए हैं। नंदा राजजात सांस्कृतिक ऐतिहासिक यात्रा है जो चमोली के नौटी गांव से शुरू होती है, और साथ ही करुड़ के मंदिर से भी दशोली और बधाण दशमद्वार की डोलिया यात्रा में शामिल होने के लिए निकलती हैं, नौटी से होमकुंड तक लगभग 280 किलोमीटर की दूरी पैदल यात्रा द्वारा तय की जाती है। इस दौरान घने जंगलों, पथरीले मार्ग, दुर्गम पहाड़, दर्रे, बर्फीले, पहाड़ों को पार करना पड़ता है।अलग-अलग रास्तों से गांव-गांव से डोलिया और छतौलिया इस यात्रा में शामिल होती है। कुमाऊं से भी अल्मोड़ा, कटारमल और नैनीताल से डोलिया नंदकेसरी में आकर नंदा राजजात यात्रा में शामिल होती हैं।
7. गंगा दशहरा:
गंगा दशहरा या दशहरा उत्तराखंड राज्य का एक प्रसिद्ध त्योहार है जो ऊपर स्वर्ग से पवित्र नदी गंगा के आगमन का जश्न मनाता है। यह त्यौहार ज्येष्ठ माह के दशमी (दसवें दिन) और कलेंडर के अनुसार मई/जून के महीने में पड़ता है जिसे दस दिनों तक मनाया जाता है। इस त्योहार की रोनक हरिद्वार, ऋषिकेश और इलाहाबाद के गंगा के घाटों पर देखी जाती है, जहाँ भक्त लगातार दस दिनों तक अपने पापों से छुटकारा पाने के लिए गंगा नदी के पानी में डुबकी लगाते हैं। इस दौरान भव्य गंगा आरती भी की जाती है जिसमे देश के विभिन्न कोनो से श्रद्धालु और पर्यटक शामिल होते है।
8. बिखोती (विषुवत संक्राति):
बिखौती त्यौहार उत्तराखंड के लोक पर्व के रूप में मनाया जाता है। बिखौती त्योहार को विषुवत संक्रांति के दिन मनाया जाता है। इसलिए इसे लोक भाषा में बिखौती त्यौहार कहा जाता है। प्रत्येक साल बैसाख माह के पहली तिथि को भगवान सूर्यदेव अपनी श्रेष्ठ राशी मेष राशी में विचरण करते हैं। इस स्थिति या संक्रांति को विषुवत संक्रांति या विशुवती त्योहार या उत्तराखंड की लोक भाषा कुमाऊनी में बिखोती त्योहार कहते हैं। विषुवत संक्रांति को विष का निदान करने वाली संक्रांति भी कहा जाता है। कहा जाता है, इस दिन दान स्नान से खतरनाक से खतरनाक विष का निदान हो जाता है। विषुवत संक्रांति के दिन गंगा स्नान का महत्व बताया गया है। बिखौती का मतलब भी कुमाउनी में विष का निदान होता है।
बिखौती त्यौहार को कुमाऊ के कुछ क्षेत्रों में बुढ़ त्यार भी कहा जाता है। बुढ़ त्यार का मतलब होता है, बूढ़ा त्यौहार।
9. इगास (बूढ़ी दीपावली):
उत्तराखंड में दिवाली के 11 दिन बाद फिर से एक दिवाली मनाई जाती जिसे इगास (बूढ़ी दीवाली) कहते हैं।
एक मान्यता के अनुसार ऐसा माना जाता है कि प्रभु श्री राम जी जब 14 वर्ष बाद लंका फतह करके वापिस दिवाली के दिन अयोध्या आये थे, तो उत्तराखण्ड के पर्वतीय ग्रामीण क्षेत्र के लोगो को इसकी जानकारी 11 दिन बाद पता चली जिस कारण उन्होंने 11 दिन बाद दिवाली मनाई थी। आज ही के दिन तुलसी जी का विवाह शालिग्राम से हुआ था।
उत्तराखंड में इगास बग्वाल 4 बार मनाई जाती है।
पहली बग्वाल कर्तिक माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को होती है।
दूसरी बग्वाल अमावस्या को पूरे देश की तरह उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊँ में भी अपनी लोक परंपराओं के साथ मनाई जाती है।
तीसरी बग्वाल बड़ी बग्वाल (दिवाली) के ठीक 11 दिन बाद आने वाली कर्तिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को उत्तराखंड गढ़वाल में मनाई जाती है। गढ़वाली में एकादशी को इगास कहते हैं, इसलिए इसे इगास बग्वाल के नाम से जाना जाता है।
चौथी बग्वाल आती है, दूसरी बग्वाल या बड़ी बग्वाल के ठीक एक महीने बाद मार्गशीष माह की अमावस्या तिथि को इसे रिख बग्वाल कहते हैं, यह गढ़वाल के जौनपुर, थौलधार, प्रतापनगर, रंवाई, चमियाला आदि क्षेत्रों में मनाई जाती हैं।
इगास बग्वाल वाले दिन सभी लोग अपने घरों की साफ़- सफाई लिपाई करते है, सुबह - सुबह मीठे पकवान बनाते हैं, गाय-बैलों की पूजा की जाती हैं। और शाम को लकड़ी के गट्ठर को जलाकर भेलो नामक नृत्य करते हैं। और साथ ही अपने पारंपरिक वाद्य यंत्रों (ढोल दमाऊं) के साथ देवताओं की पूजा अर्चना करते और नाच गाना करते हैं।
10. खतड़वा त्योहार:
उत्तराखंड में लगभग प्रत्येक संक्रान्ति (जिस दिन सूर्य भगवान राशी परिवर्तन करते हैं) के दिन त्यौहार मनाने की परम्परा है। स्थानीय भाषा मे इसे सग्यान भी कहते है। इसी क्रम में आश्विन मास की संक्रांति के दिन उत्तराखंड के कुमाऊँ मंडल के लोग खतड़वा लोक पर्व मनाते हैं। अश्विन संक्रांति को कन्या संक्रांति भी कहते हैं, क्योंकि इस दिन भगवान सूर्यदेव सिंह राशि की यात्रा समाप्त कर कन्या राशि मे प्रवेश करते हैं।
खतड़वा त्योहार को पशुओं का त्योहार या गो त्योहार भी कहा जाता है। इस दिन लोग चीड़ व अन्य वृक्षों की शाखाओं को काटकर सुखी घास-फूस को इकठ्ठा किया जाता है जिसे 'खतडुवा' कहते हैं।
खतड़वा पर्व मुख्यतः शीत ऋतु के आगमन के प्रतीक जाड़े से रक्षा की कामना तथा पशुओं की रोगों और ठंड से रक्षा की कामना के रूप में मनाया जाता है। पहले जमाने मे संचार के साधन नही थे, उस समय ऊँची ऊँची चोटियों पर आग जला कर संदेश प्रसारित किए जाते थे। संयोगवश अश्विन संक्रांति किसी राजा की विजय हुई हो या ऊँची चोटियों पर आग जला के संदेश पहुचाया हो, और लोगो ने इसे खतड़वा त्यौहार के साथ जोड़ दिया।जबकि किसी भी इतिहासकार ने यह स्पष्ट नही किया कि यह त्यौहार विजय के प्रतीक का त्यौहार है। और खतड़वा पर्व मनाने की विधियों और परम्परा से भी यह स्पष्ट होता है, कि खतरूवा, खतड़वा त्यौहार जाड़ो के आगमन का प्रतीक तथा जाड़ो से रक्षा के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।
11. चैतोल त्यौहार:
उत्तराखण्ड के कुमाऊँ मंडल में चैत्र नवरात्र में मनाया जाने वाला त्यौहार है चैतोल। मुख्यतः पिथौरागढ़, चम्पावत जिलों के विभिन्न हिस्सों में मनाये जाने वाले इस त्यौहार के स्वरूप में स्थान के अनुसार भिन्नता पायी जाती है। सोर घाटी में चैत्र नवरात्र की अष्टमी से चैतोल की धूम मचनी शुरू हो जाती है।
यहाँ इस उत्सव के केंद्र में होता है बिण गाँव में देवल समेत देवता का मंदिर। देवल समेत भगवान शिव के ही रूप माने जाते हैं।
प्रचलित जनश्रुति के अनुसार भगवान शिव का रूप माने जाने वाले लोक देवता सेराद्यौल की 22 बहने हुआ करती थीं जिन्हें इन 22 गाँवों में ब्याहा गया था। अतः भिटौली के महीने में देवल समेत देवता अपनी बहनों को भिटौली देने इन 22 गांवों में जाया करते हैं। कहा जाता है कि ये 22 बहने माँ भगवती के रूप में इन 22 गांवों में विद्यमान हैं। देवल समेत इन गांवों में पहुंचकर स्वयं अपनी बहनों को भेंट देते हैं और सभी ग्रामीणों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद भी देते हैं। इन मंदिरों में देवता स्वयं मानव शरीर में अवतरित होकर लोगों को आशीर्वाद भी देते हैं। कहा जाता है कि देवता के आशीर्वाद से फसल अच्छी होती है और प्राकृतिक आपदा का खतरा भी टल जाता है।
12. नुणाई त्यौहार:
नुणाई त्यौहार जौनसार बाबर क्षेत्र का प्रमुख त्योहार है जो की श्रावण मास में मनाया जाता है। हर साल भटाड़ मानथात में सावन महीने में नुणाई पर्व का आयोजन किया जाता है। इस मेले में खत बौंदूर के 24 गांव के लोग हिस्सा लेते हैं। साथ ही गढ़वाल, हिमाचल प्रदेेश, जौनपुर क्षेत्र से भी लोग मेले में प्रतिभाग करने आते हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार पूर्व में संसाधनों के अभाव में ग्रीष्मकाल शुरू होते ही स्थानीय लोग अपने मवेशियों को चराने के लिए डांडा अणयाति, खंडबा बुुग्याल की तरफ चले जाते थे, जो सावन मास में वापस लौटते थे। उन्हीं भेड़ पालकों के लौटने की खुशी में यह त्योहार मनाया जाता है, लेकिन अब यह त्योहार संस्कृति का एक हिस्सा बन गया है। इस मौके पर ग्रामीण आटे और गुड़ से रोट तैयार करते हैं। इस रोट को स्थानीय भाषा से सेरूवा कहते हैं।
13. जागड़ा त्योहार:
जौनसार के लोकदेवता महासू देवता के देवालय हनोल में प्रतिवर्ष भाद्रपद के शुक्ल पक्ष को हरतालिका तीज पर विशाल जागड़ा पर्व मनाया जाता है। जौनसार बावर, रंवाई-जौनपुर, हिमाचल के जुब्बल-कोटखाई, नेरवा-चौपाल, और अन्य राज्यों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु इस विशाल जागड़ा मेला का आनंद लेने और देवदर्शन के लिए आते हैं।
जागड़ा का अर्थ होता है ,रात्रि जागरण। जांगड़ा उत्सव ,उत्तराखंड गढ़वाल मंडल के देहरादून जिले में जौनसार बावर क्षेत्र के टौंस नदी के तट पर हनोल में स्थित लोकदेवता महासू से सम्बंधित एक धार्मिक उत्सव है। जागड़ा उत्सव में महासू देवता की विशेष पूजा होती है। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखकर महासू देवता का रात भर पूजा पाठ, स्तुति करते हैं और रात भर जागरण करते हैं। सुबह पुजारी महासू देवता की मूर्ति को यमुना में स्नान के लिए बाहर लाते हैं। भक्तजन देवडोली का दर्शन करते हैं और लोकवाद्यों की मधुर ध्वनि के साथ देवडोली को यमुना में स्नान के लिए लेकर जाते हैं। देवता को यमुना और भद्रीगाड़ में बारी -बारी से स्नानं कराया जाता है।
देवता की डोली को एक बार उठाने के बाद मंदिर में ही उतारते हैं। बीच में डोली को उतारने का कोई प्रावधान नहीं हैं। भक्तलोग बारी -बारी से कन्धा बदलकर बिना डोली जमीन पर उतारे मंदिर तक पंहुचा देते हैं। दयाड़ो वादन पर मंदिर में महिलाएं लोक नृत्य प्रस्तुत करती हैं। मंदिर में पुनः स्थापना के बाद देवता की पूजा होती है। पूजा की समाप्ति के बाद व्रती व्रत ख़त्म करके भोजन करते हैं।
12. जन्मो-जन्यो (रक्षा बन्धन):
शिब जू का प्यारा महीना हुआ सावन और इसी सावन की पून्यूं यानि पूर्णिमा के दिन पहाड़ में मनाई जाती है, जन्यो पून्यूं। इस दिन नई जनेऊ धारण की जाती है।
उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के पर्वतीय क्षेत्रों का सबसे पवित्र त्यौहार माना जाने वाला ‘जन्यो पुन्यू’ यानी जनेऊ पूर्णिमा और देवीधूरा सहित कुछ स्थानों पर ‘रक्षा पून्यू’ के रूप में मनाया जाने वाला लोक पर्व रक्षाबंधन के त्योहार में समाहित हो गया है। श्रावणी पूर्णिमा के दिन मनाए जाने इस त्योहार पर परंपरागत तौर पर उत्तराखंड में पंडित-पुरोहित अपने यजमानों को अपने हाथों से बनाई गई जनेऊ (यज्ञोपवीत) का वितरण आवश्यक रूप से नियमपूर्वक करते थे, जिसे इस पर्व के दिन सुबह स्नान-ध्यान के बाद यजमानों के द्वारा गायत्री मंत्र के साथ धारण किया जाता था। इस प्रकार यह लोक-पर्व भाई-बहन से अधिक यजमानों की रक्षा का लोक पर्व रहा है।
इसके अलावा भी इस दिन वृत्तिवान ब्राह्मण अपने यजमानों को यज्ञोपवीत धारण करवाकर तथा रक्षा-धागा बांधकर दक्षिणा लेते हैं। वह सुबह ही अपने यजमानों के घर जाकर उन्हें खास तौर पर हाथ से तकली पर कातकर तैयार किए गए रक्षा धागे ‘येन बद्धो बली राजा, रक्षेः मा चल मा चल’ मंत्र का उच्चारण करते हुए पुरुषों के दांए और महिलाओं के बांए हाथ में बांधते हैं। प्राचीन काल में यह परंपरा श्रत्रिय राजाओं को पंडितों द्वारा युद्ध आदि के लिए रक्षा कवच प्रदान करने का उपक्रम थी।
13. सातूं आँठू पर्व:
भगवान् के साथ मानवीय रिश्ते बनाकर ,उनकी पूजा अर्चना और उनके साथ आनंद मानाने का त्यौहार है , सातू आठू त्यौहार। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ व् कुमाऊँ के सीमांत क्षेत्र में मनाया जाने वाला यह त्यौहार प्रतिवर्ष भाद्रपद की पंचमी से शुरू होकर अष्टमी तक चलता है।
सातू आठू पर्व में महादेव शिव को भिनज्यू (जीजाजी) और माँ गौरी को दीदी के रूप में पूजने की परम्परा है। सातो आठो का अर्थ है सप्तमी और अष्टमी का त्यौहार। भगवान शिव को और माँ पार्वती को अपने साथ दीदी और जीजा के रिश्ते में बांध कर यह त्यौहार मनाया जाता है। यही इस त्यौहार की सबसे बड़ी विशेषता है। कहते है ,जब दीदी गवरा (पार्वती) जीजा मैशर (महेश्वर यानि महादेव) से नाराज होकर अपने मायके आ जाती है, तब महादेव उनको वापस ले जाने ससुराल आते है। दीदी गवरा की विदाई और भिनज्यू (जीजाजी) मैशर की सेवा क रूप में यह त्यौहार मनाया जाता है। यह त्यौहार कुमाऊँ सीमांत में सांतू आंठू के नाम से तथा, नेपाल में गौरा महेश्वर के नाम से मनाया जाता है। इस लोक पर्व को गमारा पर्व भी कहा जाता है।
इस दिन गाँव-घरों में एक तांबे के बर्तन को साफ करके धोने के बाद इस पर गाय के गोबर से पाँच आकृतियाँ बनाई जाती हैं और उन पर दुब घास लगाई जाती है और इनपर अछ्त पीठाँ (टीका) लगा कर उस बर्तन में पाँच या सात प्रकार के अनाज के बीजों को भिगाया जाता है इन बीजों में मुख्यतया गेहूं, चना, भट्ट, मास, कल्यूं, मटर, गहत आदि होते हैं। पंचमी को भीगा ने के बाद सातों के दिन इन्हें पानी के धारे पर ले जाकर धोया जाता है जहां पर पाँच या सात पत्तों में इन्हें रखकर भगवान को भी चड़ाया जाता है। फिर आठों के दिन इन्हें गौरा-महेश को चड़ा कर व्रत टूटने के बाद में इसको प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है। और सभी बड़े, बुजुर्ग, बच्चे एक दूसरे का बिरुड चढ़ाते है और आशीर्वाद देते हैं। साम को इन्हें पकाया भी जाता है।
14. कांग्डली महोत्सव:
पिथौरागढ़ की धारचूला तहसील की चौदांस पट्टी में रं संस्कृति के लोग निवास करते हैं, जो अपनी लोक संस्कृति और सामाजिक सद्भाव के लिये जाने जाते हैं। चीन और नेपाल सीमा से लगे सीमांत के चौदांस क्षेत्र में बारह वर्षों बाद बुराई का प्रतीक माने जाने वाले कंडाली वनस्पति को नष्ट किया जाता है। कंडाली महोत्सव को लेकर लोगों में खासा उत्साह देखने को मिलता है। ग्रामीणों द्वारा कंडाली को नष्ट कर आने वाले बारह वर्षों के लिये क्षेत्र को संभावित सभी कष्टों से मुक्त होना माना जाता है। कंडाली पर्व को भी कुंभ की तर्ज पर बारह वर्ष में मनाया जाता है। पर्व में रिल और तलवार से दुश्मन का प्रतीक मानी जाने वाली वनस्पति (कंडाली) को नष्ट किया जाता है।
यह त्योहार कंडाली के पौधे के खिलने के साथ मेल खाता है, जो हर बारह साल में एक बार फूल देता है। यह अगस्त और अक्टूबर के बीच में आयोजित किया जाता है। यह जोरावर सिंह की सेना की हार का जश्न मनाता है, जिसने 1841 में लद्दाख से इस क्षेत्र पर हमला किया था। बताया जाता है की काली नदी के किनारे से लोट रहे सैनिकों ने कंडाली पौधे के पीछे छुपकर लूट लिया था। महिलाओं ने उनका विरोध करते हुए काडंली के पौधे को नष्ट कर दिया। इसलिए कंडाली को अशुभ पौधा मन जाता है और उसका नाश किया जाता है।
एक अन्य लोक कथा के अनुसार सदियों पूर्व इस क्षेत्र में रहने वाली महिला का इकलौता 12 वर्षीय पुत्र बीमार पड़ गया था। उस समय सिर्फ जड़ी-बूटी से ही उपचार किया जाता था। जब बीमार बच्चे का कंडाली के पौधे से उपचार किया गया तो, लड़के की मौत हो गयी। इकलौते बच्चे की मौत के बाद महिला ने वनस्पति को श्राप दिया कि बारहवें वर्ष में जब तेरी टहनियां भी बारह हो जाएंगी तब तुझे भी नष्ट कर दिया जाएगा। तब से ही 12 साल में कंडाली उत्सव का आयोजन कर उसके पौधों को नष्ट किया जाता है।
15. बैसी त्यौहार:
बैसी उत्तराखण्ड में सावन के महीने में 22 दिनों तक मनाया जाने वाला लोकपर्व है। यह त्यौहार खरीफ की फसल में जुटकर थक चुके किसानों में नयी उमंग पैदा करता है। इस त्यौहार में किये जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान में सुख समृद्धि की कामना से इष्ट देवताओं की पूजा की जाती है। इसे सैम, एड़ी, गोलू, गंगनाथ आदि लोकदेवताओं के पूजास्थलों के प्रांगण में मनाये जाने की परंपरा है।
इसमें विधिवत पूजा-अर्चना करा सकने वाले डंगरिये (जिनके आंग में देवता आता हो) को अनुष्ठान पूर्ण करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। पूजा विधान की सम्पूर्ण जानकारी रखने वाले इन व्यक्तियों को 22 दिनों तक मंदिर में ही रहना होता है। इन्हें तपसी डंगरिये कहा जाता है। तपसी डंगरिये दिन में दो बार स्नान करते है। इस दौरान इन्हें ब्रहमचर्य का पालन करते हुए सात्विक भोजन करना होता है। अगर तपसी डंगरिया अपने संकल्पों से डिगता है तो उसे अघोरी कहा जाता है। ऐसा होने की स्थिति में मंदिर में सांप दिखाई देता है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए मंदिर में पुरोहित द्वारा शांति पाठ कराया जाता है।
पूरा गाँव बैसी के इस त्यौहार में हिस्सेदारी करता है। लेकिन बैसी के सभी कार्यों में भागीदारी करने वाले और इसका खर्च वहन करने वाले हिस्सेदारों को स्यौक कहा जाता है। स्यौक ही डंगरिये भी तय करते हैं।
इस दौरान दिन में तीन बार देव आराधना कर मंदिर की परिक्रमा की जाती है। रात को जगर लगाकर देवताओं का आह्वान किया जाता है। प्रसाद के रूप में दूध, गुड़ और गेहूं के आते से बनी बैसी रोटी प्रसाद के रूप में बांटी जाती है। बीसवें दिन भिच्ची का आयोजन किया जाता है। इसमें देव हथियारों को लेकर सारे गाँव में भिक्षाटन किया जाता है। लौकी से बने तुमड़े की प्रदर्शनी भी इस त्यौहार का प्रमुख आकर्षण होती है। उत्सव के अंत में बाइसवें दिन भंडारे का आयोजन भी किया जाता है।
16. पूर्णागिरि मेला:
पूर्णागिरि मेला उत्तराखंड के प्रसिद्ध मेले में से एक है जिसे देवी सती की स्मृति में मनाया जाता है। यह मेला प्रतिवर्ष चैत्र नवरात्रि की अवधि के दौरान पूर्णागिरि मंदिर में आयोजित होता है और दो महीने से अधिक समय तक चलता है।
यह मेला उत्तराखंड का लोकप्रिय मेला है जिसमे राज्य के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु और पर्यटक शामिल होते है। यह मेला समुद्र तल से 1650 मीटर पर स्थित पूर्णागिरि मंदिर परिसर में लगता है जहाँ से हिमालय के मनोरम दृश्यों को भी देखा जा सकता है जो इस मेले के अन्य आकर्षण के रूप में कार्य करते है।
17. स्याल्दे बखौती मेला:
उत्तराखंड के द्वाराहाट में यह सांस्कृतिक और व्यपारिक मेला अप्रैल-मई के महीने में आयोजित होता है। द्वाराहाट को सांस्कृतिक नगरी कहा जाता है। यहाँ पांडव काल के, तथा कत्यूरी राजाओं के बनाये अनेक मंदिर है। स्याल्दे बिखोति के मेले में दूर दूर से व्यापारी आते हैं।
स्याल्दे बिखौती मेले का व्यपारिक के साथ संस्कृतिक महत्व भी है। यहाँ राज्य के कोने कोने से कलाकारों के दल आते है, अपनी कला प्रस्तुतियां देने हेतु तथा कुमाउनी लोग नृत्य व गीत झोड़ा चाचरी की धूम रहती है यहां की सांस्कृतिक पहचान है ओढ़ा भेटने की रस्म।
कहते हैं, प्राचीन काल मे स्थानीय गाव के लोग यहाँ शीतला देवी के मंदिर में आते थे और पूजा पाठ करके जाते थे। किंतु एक बार कुछ गावो के बीच खूनी संघर्ष हो गया। और खूनी संघर्ष इतना बढ़ गया कि हारे हुवे गावो के सरदार का सिर काट कर गाड़ दिया। जिस स्थान पर उसका सिर काट कर गाड़ा गया ,वहाँ परस्मृति चिन्ह के रूप में एक बड़ा पत्थर स्थापित कर दिया गया। इसी पत्थर को ओढ़ा कहा जाता है। यह पत्थर द्वाराहाट चौक में आज भी है। और इसी पत्थर (ओढ़ा) पर चोट मार कर आगे बढ़ते हैं। और ओढ़े पर चोट मारकर आगे बढ़ने की रस्म को ओढ़ा भेटना कहते हैं। यह कार्य हर बार स्याल्दे के मेले में होता है। धीरे धीरे यह परंपरा बन गई और आज यह स्याल्दे बिखौती मेले की सांस्कृतिक पहचान है।
18. कांवड़ यात्रा:
कांवर यात्रा (कावड़ यात्रा) शिव के भक्तों की एक वार्षिक तीर्थ यात्रा है, जिसे उत्तराखंड के हरिद्वार, गौमुख और गंगोत्री के हिंदू तीर्थ स्थानों में गंगा नदी के पवित्र जल को लाने के लिए कांवरिया (कावड़िया) के रूप में जाना जाता है। त्योहार मानसून माह श्रावण (जुलाई-अगस्त) के दौरान चलते हैं।
महीने भर की यात्रा के दौरान, देश भर से भगवान शिव के लाखों भक्त गंगा नदी के किनारे (हरिद्वार, गंगोत्री, गौमुख, आदि) की यात्रा करते हैं। यात्रा के दौरान हरिद्वार और गंगोत्री में मेले का आयोजन भी किया जाता है जिनमे देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु शामिल होते है। इस आयोजन की भव्यता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हरिद्वार में गंगा नदी के घाटों पर एकत्रित होने वाली श्र्धालुयों की संख्या को भारत की सबसे बड़ी बड़ी मानव सभा के रूप में दर्ज किया गया है।
19. बिस्सू मेला:
देहरादून के चकराता ब्लॉक में आयोजित, बिस्सू मेला उत्तराखंड के प्रमुख मेलो में से एक है जिसे विशेषकर जौनसारी जनजाति द्वारा मनाया जाता है। इस मेले में लोग देवी दुर्गा के अवतार ‘संतूरो देवी’ के प्रति अपने प्यार और स्नेह को स्नान करने के लिए इकट्ठा होता है।
उत्तराखंड का यह त्यौहार अच्छी फसल का आभार प्रकट करने के लिए साल में एक बार मनाया जाता है। टिहरी, सहारनपुर, उत्तरकाशी जैसे अन्य गांवों और शहरों से बहुत से लोग उत्तराखंड के इस मेले को मनाने के लिए चकराता आते हैं क्योंकि यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक गतिविधियों में से एक है। इस उत्तराखंड त्योहार को मनाने के लिए लोग पूरे सप्ताह चमकीले कपड़े पहनते हैं, लोक गीत गाते हैं और नृत्य करते हैं।
20. माघ मेला:
उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जिले में लगने वाला माघ मेला उत्तराखंड के लोकप्रिय मेले में से एक है। इस मेले का प्रतिवर्ष मकर संक्राति के दिन पाटा-संग्राली गांवों से कंडार देवता के साथ-साथ अन्य देवी देवताओं की डोलियों का उत्तरकाशी पहुंचने पर शुभारम्भ होता है। यह मेला 14 जनवरी मकर संक्राति से प्रारम्भ हो 21 जनवरी तक चलता है।
मेले के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहाँ आते है और गंगा नदी में डुबकी लगाते हैं। वहीं सुदूर गांव के ग्रामवासी अपने-अपने क्षेत्र के ऊन एवं अन्य हस्तनिर्मित उत्पादों को बेचने के लिये भी इस मेले में आते हैं। इसके अतिरिक्त प्राचीन समय में यहाँ के लोग स्थानीय जडी-बूटियों को भी उपचार के लिये लाते थे किन्तु वर्तमान समय में इस पर प्रतिबन्ध लगने के कारण अब मात्र ऊन आदि के उत्पादों का ही यहाँ पर विक्रय होता है।
यहाँ मेला आधुनिक समय में पूरे उत्तराखंड के स्थानीय कारीगरों और स्थानीय कारीगरों के हस्तशिल्प को प्रदर्शित भी करता है।
21. उत्तरायणी मेला:
उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में सरयू ,गोमती और गुप्त भागीरथी के संगम पर भगवान शिव बागनाथ के रूप में विराजित हैं। मकर संक्रांति के अवसर पर प्रतिवर्ष यहाँ विशाल मेले का आयोजन किया जाता है, जो उत्तरायणी मेला के नाम से प्रसिद्ध है। यह मेला लगभग एक सप्ताह तक चलता है। इस अवसर पर दूर -दूर से श्रद्धालु आते हैं, और मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर संगम में स्नान करते हैं और स्वयंभू बागनाथ जी के दर्शन करके आशीष लेते हैं। उत्तरैणी कौतिक के शुभावसर पर बच्चों के मुंडन संस्कार, जनेऊ संस्कार भी होते हैं। इस मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की घूम मची रहती है। इस मेले में भोटान्तिक और तराई क्षेत्र से व्यपारी अपना सामान बेचने के लिए यहाँ आते हैं। वे यहाँ ऊन से बने सामान, दन, पश्मीने, कम्बल आदि और कुटीर उद्योगों में बने चटाई, काष्ठपात्र और पहाड़ी जड़ी बूटियां, शिलाजीत, जम्बू , गंद्रैणी, नमक सुहागा आदि बेचने के लिए लाते है।
प्राचीन काल से ही बागेश्वर कुमाऊं का एक बड़ा व्यपारिक केंद्र रहा है।उत्तरायणी कौतिक की शुरुवात इतिहासकार चंद शाशन से मानते हैं। पहले लोग यहाँ मकर संक्रांति के स्नान के लिए आते थे। यातायात के सुचारु साधन न होने के कारण लोग कई दिन पहले से घर से निकल जाते थे। और सरयू के बगड़ में (कुमाउनी में नदी के तट को बगड़ कहते हैं) तंबू गाड़ कर रहते थे। और स्नान आदि करके अपने -अपने घरों को लौट जाते थे। रस्ते के मनोरंजन के लिए साथ में हुड़का आदि वाद्य यंत्रो को साथ लाते थे। रस्ते भर गीत, छपेली, जोड़ आदि सांस्कृतिक गीत गाते हुए यहाँ पहुँचते थे, और स्नानं के शुभ मुहूर्त तक भी गीत-संगीत का मनोरंजन चलता रहता था। उस समय ठण्ड से बचने और प्रकाश कि वयस्था अलाव जलाकर की जाती थी। धीरे-धीरे धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से उत्पन्न मेला सांस्कृतिक के साथ व्यपारिक मेला भी बन गया।
स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास की दृष्टि से भी बागेश्वर और उत्तरायणी कौतिक का विशेष महत्व रहा है। 14 जनवरी 1921 को उत्तरायणी मेले के अवसर पर कुमाऊं के राष्ट्रीय नेताओं के नेतृत्व में ,अंग्रेजों द्वारा तैयार किये गए "कुली बेगार रजिस्टरों" को सरयू में फेंक कर कुली बेगार प्रथा के अंत करने की प्रतिज्ञा ली।
22. बग्वाल मेला:
कुमाऊं में केवल अब एक ही बग्वाल मनाई जाती है। इसे श्रावणी पूर्णिमा के दिन अर्थात रक्षाबंधन के दिन चम्पावत जिले के देवीधुरा माँ बाराही के मंदिर में खेला जाता है। परम्परा के अनुसार आषाढ़ी मेला शुरू छपने के दिन (श्रावण शुक्ल एकादशी) के दिन इस पत्थर युद्ध में भाग लेने वाले महर व् फ़र्त्यालो के चार खामो - गहड़वाल, चम्याल, वालिग और लमगड़िया एवं सात थोको के मुखिया वाराही देवी के मंदिर में शुभमुहूर्त पर देवी के डोले की पूजा करते हैं। इसे सांगी पूजा कहा जाता है। इसके बाद ये लोग दूसरे को पारम्परिक रूप से पूर्णमासी की बग्वाल के लिए आमंत्रित करते हैं।
बग्वाल का अर्थ होता है, पत्थरों की बारिश या पत्थर युद्ध का अभ्यास। मेले को ऐतिहासिकता कितनी प्राचीन है इस विषय में मत-मतान्तर हैं । लेकिन आम सहमति है कि नर बलि की परम्परा के अवशेष के रुप में ही बगवाल का आयोजन होता है। पत्थर युद्ध पहाड़ी योद्धाओं की एक विशिष्ट सामरिक प्रक्रिया रही है। महाभारत में इन्हे पाषाण योधि, अशम युद्ध विराशद कहा गया है। जिस प्रकार वर्षाकाल की समाप्ति पर पर्वतों के राजपूत राजाओं द्वारा युद्धाभ्यास किया जाता था। ठीक उसी प्रकार छोटे-छोटे ठाकुरी शाशकों या मांडलिकों द्वारा भी वर्षाकाल की समाप्ति पर पत्थर युद्ध का अभ्यास किया जाता था जिसे बग्वाल कहा जाता था।
23. नंदा देवी मेला:
उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में प्रमुख त्योहारों में से एक, नंदा देवी मेला अल्मोड़ा, नैनीताल, बागेश्वर, भौली जैसी जगहों पर आयोजित किया जाता है।यह मेला हर साल सितंबर के महीने में आयोजित किया जाता है।अल्मोड़ा वह स्थान है जहाँ मुख्य मेला आयोजित किया जाता है। नंदा देवी मेला, जिसे नंदा देवी महोत्सेव के नाम से भी जाना जाता है, को तब से मनाया जाता है जब चंद राजाओं ने 5 दिन या 7 दिन की अवधि के साथ इस स्थान पर शासन किया था। मेला आमतौर पर नंदशटामी के त्योहार के आसपास होता है, जो राज्य के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है।
अल्मोड़ा में नंदादेवी के मेले का इतिहास यद्यपि अधिक ज्ञात नहीं है तथापि माना जाता है कि राजा बाज बहादुर चंद (सन् १६३८-७८) ही नंदा की प्रतिमा को गढ़वाल से उठाकर अल्मोड़ा लाये थे। इस विग्रह को वर्तमान में कचहरी स्थित मल्ला महल में स्थापित किया गया। बाद में कुमाऊँ के तत्कालीन कमिश्नर ट्रेल ने नंदा की प्रतिमा को वर्तमान से दीप चंदेश्वर मंदिर में स्थापित करवाया था। अल्मोड़ा शहर सोलहवीं शती के छटे दशक के आसपास चंद राजाओं की राजधानी के रुप में विकसित किया गया था। यह मेला चंद वंश की राज परम्पराओं से सम्बन्ध रखता है तथा लोक जगत के विविध पक्षों से जुड़ने में भी हिस्सेदारी करता है।
पंचमी तिथि से प्रारम्भ मेले के अवसर पर दो भव्य देवी प्रतिमायें बनायी जाती हैं। यह प्रतिमायें कदली स्तम्भ से निर्मित की जाती हैं। नंदा की प्रतिमा का स्वरुप उत्तराखंड की सबसे ऊँची चोटी नंदादेवी के सद्वश बनाया जाता है। स्कंद पुराण के मानस खंड में बताया गया है कि नंदा पर्वत के शीर्ष पर नंदादेवी का वास है। भगवती नंदा की पूजा तारा शक्ति के रुप में षोडशोपचार, पूजन, यज्ञ और बलिदान से की जाती है। सम्भवत: यह मातृ-शक्ति के प्रति आभार प्रदर्शन है जिसकी कृपा से राजा बाज बहादुर चंद को युद्ध में विजयी होने का गौरव प्राप्त हुआ।
षष्ठी के दिन गोधूली बेला में केले के पोड़ों का चयन विशिष्ट प्रक्रिया और विधि-विधान के साथ किया जाता है। षष्ठी के दिन पुजारी गोधूली के समय चन्दन, अक्षत, पूजन का सामान तथा लाल एवं श्वेत वस्र लेकर केले के झुरमुटों के पास जाता है। धूप-दीप जलाकर पूजन के बाद अक्षत मुट्ठी में लेकर कदली स्तम्भ की और फेंके जाते हैं। जो स्तम्भ पहले हिलता है उससे नन्दा बनायी जाती है। जो दूसरा हिलता है उससे सुनन्दा तथा तीसरे से देवी शक्तियों के हाथ पैर बनाये जाते हैं। कुछ विद्धान मानते हैं कि युगल नन्दा प्रतिमायें नील सरस्वती एवं अनिरुद्ध सरस्वती की हैं। पूजन के अवसर पर नन्दा का आह्मवान 'महिषासुर मर्दिनी' के रुप में किया जाता है।
सप्तमी के दिन झुंड से स्तम्भों को काटकर लाया जाता है। इसी दिन कदली स्तम्भों की पहले चंदवंशीय कुँवर या उनके प्रतिनिधि पूजन करते है। उसके बाद मंदिर के अन्दर प्रतिमाओं का निर्माण होता है। प्रतिमा निर्माण मध्य रात्रि से पूर्व तक पूरा हो जाता है। मध्य रात्रि में इन प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा व तत्सम्बन्धी पूजा सम्पन्न होती है।
मुख्य मेला अष्टमी को प्रारंभ होता है। इस दिन ब्रह्ममुहूर्त से ही मांगलिक परिधानों में सजी संवरी महिलायें भगवती पूजन के लिए मंदिर में आना प्रारंभ कर देती हैं। दिन भर भगवती पूजन और बलिदान चलते रहते हैं। अष्टमी की रात्रि को परम्परागत चली आ रही मुख्य पूजा चंदवंशीय प्रतिनिधियों द्वारा सम्पन्न कर बलिदान किये जाते हैं। मेले के अन्तिम दिन परम्परागत पूजन के बाद भैंसे की भी बलि दी जाती है। अन्त में डोला उठता है जिसमें दोनों देवी विग्रह रखे जाते हैं। नगर भ्रमण के समय पुराने महल ड्योढ़ी पोखर से भी महिलायें डोले का पूजन करती हैं। अन्त में नगर के समीप स्थित एक कुँड में देवी प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है।
मेले के अवसर पर कुमाऊँ की लोक गाथाओं को लय देकर गाने वाले गायक 'जगरिये' मंदिर में आकर नंदा की गाथा का गायन करते हैं। मेला तीन दिन या अधिक भी चलता है। इस दौरान लोक गायकों और लोक नर्तको की अनगिनत टोलियाँ नंदा देवी मंदिर प्राँगन और बाजार में आसन जमा लेती हैं। झोड़े, छपेली, छोलिया जैसे नृत्य हुड़के की थाप पर सम्मोहन की सीमा तक ले जाते हैं। कहा जाता है कि कुमाऊँ की संस्कृति को समझने के लिए नंदादेवी मेला देखना जरुरी है। मेले का एक अन्य आकर्षण परम्परागत गायकी में प्रश्नोत्तर करने वाले गायक हैं, जिन्हें बैरिये कहते हैं। वे काफी सँख्या में इस मेले में अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।
24. अंदूरी उत्सव (बटर फेस्टिवल):
उत्तराखंड एक प्राकृतिक प्रदेश है। यहाँ के निवासियों का और प्रकृति का बहुत ही घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्रकृति यहाँ के लोगो को एक आदर्श जीवनचर्या के लिए एक माँ की तरह सारी सुविधाएँ देती है। बदले में उत्तराखंड के निवासी समय समय पर प्रकृति की रक्षा और उसके सवर्धन से जुड़े पर्व, उत्सव मना कर प्रकृति के प्रति अपना आभार प्रकट करना नहीं भूलते।
उत्तरकाशी में रैथल ग्रामवासी मखमली बुग्याल दायरा में भाद्रपद की संक्रांति को अपने मवेशियों के ताजे दूध, दही, मठ्ठा और मक्खन प्रकृति को अर्पित करके उत्सव मनाते हैं। जिसे अंढूड़ी उत्सव या बटर फेस्टिवल (Butter Festival ) कहते हैं ।
गर्मियां शुरू होते ही रैथल के ग्रामीण अपने अपने मवेशियों को लेकर दायरा बुग्याल पहुंच जाते हैं। दायरा बुग्याल समुद्रतल से 11000 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है। और यह बुग्याल 28 वर्ग किलोमीटर में फैला हुवा है। रैथल के ग्रामीण दायरा बुग्याल और ,गोई ,चिलपाड़ा में बनी अपनी छानियों में ग्रीष्मकाल में निवास के लिए अपने मवेशियों को वहाँ पंहुचा देते हैं। बुग्यालों की मखमली और औषधीय घास और अनुकूलित वातावरण से मवेशियों का दुग्ध उत्पादन बढ़ने के साथ औषधीय गुणों से युक्त हो जाता है। अगस्त अंतिम सप्ताह और सितम्बर से पहाड़ों में ठण्ड का आगमन हो जाता है।
ठण्ड बढ़ने से पहले सभी गावंवासी अपने-अपने मवेशियों को वापस अपने घरों को लाने के लिए जाते हैं। ग्रामीण मानते हैं कि लगभग 5 माह प्रकृति उनके पशुधन की रक्षा और पालन पोषण करती है। पशुधन को घर लाने से पहले ,वे प्रकृति का आभार प्रकट करने के लिए इस उत्सव का आयोजन करते हैं। लोगो का मानना है कि ,प्रकृति के इस खूबसूरत बुग्याल के कारण उनके पशु गुणवत्ता युक्त दूध का उत्पादन कर रहे हैं। इसलिए उस गुणवत्ता युक्त उत्पादन का कुछ भाग प्रकृति को चढ़ा कर , प्रकृति की गोद में खुशियां मनाकर प्रकृति और सर्वशक्तिमान ईश्वर का आभार व्यक्त करना चाहिए। बटर फेस्टिवल ( butter festival ) अंढूड़ी उत्सव प्रतिवर्ष भाद्रपद की संक्रांति यानि 16 -17 अगस्त को मनाया जाता है।
पशुधन के घर आने की ख़ुशी में बटर फेस्टिवल (अंढूड़ी उत्सव ) के दिन ग्रामीण अपने घरों को सजाते हैं। butter festival की तैयारियां हफ़्तों पहले से शुरू हो जाती हैं। लोग अपने संबंधियों को butter festival के लिए आमंत्रित करते हैं। इस उत्सव के दिन लोग दूध दही , ढोल -दमाऊ आदि पारम्परिक वाद्य यंत्रों के साथ दायरा बुग्याल पहुंच जाते हैं। वहां एक दूसरे पर दूध मट्ठा फेक कर , और एक दूसरे को मक्खन लगाकर मक्खन की होली मनाई जाती है। महाराष्ट्र की जन्माष्टमी की तरह दही हांड़ी उत्सव का आयोजन भी किया जाता है।
उत्तराखंड के त्योहार बहुत रंगीन और विशिष्ट हैं और विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों का मिश्रण हैं। उत्तराखंड के लोगों के रंग और खुशी के उत्सव के लिए प्यार अच्छी तरह से विस्तृत अनुष्ठानों और समलैंगिक परित्याग से परिलक्षित होता है जिसके साथ वे खुद को क्षेत्र के कई त्योहारों के लिए आत्मसमर्पण करते हैं। उत्तराखंड के लोग बहुत उत्साह और उत्साह के साथ राष्ट्र के सभी प्रमुख त्योहार मनाते हैं। राज्य में मनाए जाने वाले रंग-बिरंगे त्योहारों ने उत्तराखंड की संस्कृति को खत्म कर दिया। उत्तराखंड के त्योहारों ने राज्य को समृद्ध बनाने में योगदान दिया है।































