वह महिला जो साहस, शक्ति और प्रकृति के प्रति प्रेम की प्रतीक थी - Gaura Devi


उत्तराखंड की धरती को अगर आंदोलनों की धरती कहा जाए तो गलत नहीं होगा 1921 का कुली बेगार आन्दोलन, 1930 का तिलाड़ी आन्दोलन, 1984 का नशा नहीं रोजगार दो आन्दोलन, 1994 का उत्तराखंड राज्य प्राप्ति आन्दोलन, ऐसे छोटे बड़े कई आंदोलनों ने यह बात सिद्ध की है कि यहां की मिट्टी में पैदा हुआ हर इंसान अपने हक की लड़ाई लड़ना जानता है, फिर वो पुरुष हो या फिर महिला आज हम उत्तराखंड के एक ऐसे आंदोलन की बात करेंगे जिसने एक साधारण सी महिला को इतने बड़े आंदोलन की नेत्री बना दिया


पर्यावरण के बदलाव की बात करें तो लगभग हर तरह से अब जलवायु परिवर्तन का असर दिखने लगा है। पूरी दुनिया में  तरह-तरह के मूवमेंट चलाए जा रहे हैं। पर भारत के इतिहास की बात करें तो पर्यावरण को बचाने के लिए चिपको आंदोलन से ज्यादा मजबूत कोई आंदोलन नहीं था। इस ऐतिहासिक पहल ने उत्तराखंड के एक पूरे के पूरे समुदाय को ही पर्यावरण का रक्षक बना दिया था।


गाहे-बगाहे आपने भी पेड़ से चिपकी हुई महिलाओं की तस्वीर देखी होगी। उत्तराखंड (तब के उत्तर प्रदेश) की अलकनंदा घाटी में 70 के दशक में ली गई तस्वीर एक बड़े आंदोलन का हिस्सा थी जो था चिपको आंदोलन। इस आंदोलन की नायिका थीं गौरा देवी जिन्होंने पेड़ों को कटवाने की मुहिम के खिलाफ अपनी आवाज उठाई थी। उत्तराखंड के रैणी गाँव की गौरा देवी का व्यक्तिगत जीवन संघर्षपूर्ण रहा उनके जीवन की कहानी प्रेरक है

कौन थी गौरा देवी ?

कौन थी गौरा देवी ?


गौरा देवी का जन्म 1925 में चमोली जिला के लाटा नाम के गांव में हुआ था। उन्होंने पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी। उनका परिवार पर्यावरण पर निर्भर करता था। उसकी माँ हमेशा उसे जंगलों के महत्व को बताती थीं। जो खाना पकाने के लिए ईंधन का एक स्रोत था। उसे बताया गया कि मिट्टी के कटाव को रोकने और पहाड़ों को एक साथ रखने के लिए पेड़ों की जड़ें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उनकी माँ ने उनको बताया कि पेडों की जड़ें मिट्टी के कटाव को रोकती हैं नहीं तो एक दिन उनका गांव बाढ़ में जाएगा। उनकी माँ की शिक्षाओं ने उनकी मान्यताओं को मजबूत किया जिसके कारण वह गौरा देवी के रूप में एक महान भूमिका निभाई।


केवल 11 वर्ष की उम्र में उनकी शादी रैंणी गांव के मेहरबान सिंह नाम के व्यक्ति से हुई। रैंणी भोटिया लोगों का आवासीय गांव था। ये लोग अपनी गुजर-बसर के लिये पशुपालन, ऊनी कारोबार और खेती-बाड़ी किया करते थे। जब गौरा देवी 22 वर्षीय थी तभी उनके पति का देहांत हो गया था, तब उनका एकमात्र पुत्र चन्द्र सिंह मात्र ढाई साल का था। गौरा देवी ने ससुराल में रहकर छोटे बच्चे की परवरिश, वृद्ध सास-ससुर की सेवा और खेती-बाड़ी, कारोबार के लिये अत्यन्त कष्टों का सामना करना पड़ा। उन्होंने अपने पुत्र को स्वालम्बी बनाया





चिपको आन्दोलन की शुरुआत:


उन दिनों भारत-तिब्बत व्यापार हुआ करता था, गौरा देवी ने उसके जरिये भी अपनी आजीविका का निर्वाह किया। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद यह व्यापार बन्द हो गया तो चन्द्र सिंह ने ठेकेदारी, ऊनी कारोबार और मजदूरी द्वारा आजीविका चलाई। 1970 की अलकनंदा की बाढ़ ने नयी पर्यावरणीय सोच को जन्म दिया। चंडी प्रसाद भट्ट ने गोपेश्वर, जिला चमोली में कार्यरत संस्था “दशौली ग्राम स्वराज्य मंडल” के स्वयं सेवकों को बाढ़ सुरक्षा कार्य करने के साथ-साथ बाढ़ आने के कारणों को भी समझाया।


भारत-चीन युद्ध के बाद भारत सरकार को चमोली की सुध आई और यहाँ पर सैनिको के लिए सुगम मार्ग बनाने के लिए पेड़ों की कटाई की शुरूआत हुई बाढ़ से प्रभावित लोग के हृदय में पेड़ों और पहाड़ो के प्रति संवेदना जागी और महिला मंगल दलों की स्थापना हुई


गौरा देवी के अपने स्ट्रगल से महिलाओं को आगे बढ़ने का जज्बा सिखाया। उन्होंने पंचायत में महिलाओं को आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया। उनके काम को देखते हुए 1972 में गांव की महिलाओं ने उन्हें महिला मंगल दल की प्रमुख बनने का न्योता दिया। गौरा देवी उस वक्त 40 की उम्र पार कर चुकी थीं, लेकिन उन्होंने ये न्योता स्वीकारा। इस संस्था का काम था स्थानीय जंगल की रक्षा करना और सफाई का ध्यान रखना।


नवम्बर 1973 और उसके बाद गोबिन्द सिंह रावत, चण्डी प्रसाद भट्ट, वासवानंद नौटियाल, हयात सिंह तथा कई छात्र उस क्षेत्र में आए। आस पास के गांवो तथा रैणी में सभाएं हुईं। जनवरी 1974 में रैंणी गांव के 2459 पेड़ों को चिन्हीत किया गया । 23 मार्च को रैंणी गांव में पेड़ों का कटान किये जाने के विरोध में गोपेश्वर में एक रैली का आयोजन हुआ, जिसमें गौरा देवी ने महिलाओं का नेतृत्व किया। यहीं से चिपको आन्दोलन की शुरुआत हुई।



24 मार्च 1974 को चिपको आंदोलन की मुख्य घटना हुई थी इस दिन रैणी के जंगलों को काटने का आदेश दिया गया हालांकि इन जंगलों को बचाने के लिए पिछले तीन सालों से आंदोलन चल रहा था यहां के पुरुषों ने पूरी मुस्तैदी से मोर्चा संभाला था लेकिन सरकार की कूटनीति कहिए या फिर संयोग कि इसी दिन लोगों को उनके उन खेतों का मुआवजा दिए जाने का आदेश हुआ जो 1962 के बाद सड़क बनने के कारण उनसे छिन गए थेकिसी भी आंदोलन पर गरीबी भारी पड़ने लगती है, यही कारण रहा कि यहां के मलारी, लाता तथा रैणी के सभी पुरुष मुआवजा लेने चमोली चले गए


जब अधिकारी और लकड़हारे जंगलों की ओर बढ़ने लगे तो उन्हें रोकने के लिए गाँव में कोई पुरुष नहीं था। गौरा देवी को तुरंत स्थानीय महिलाओं द्वारा सूचित किया गया। उसने पुरुषों के बिना लड़ने का फैसला किया। गौरा देवी ने इस आंदोलन की अगुवाई करते हुए 27 अन्य महिलाओं को अपने साथ लिया और 2400 पेड़ों की कटाई रोकने के प्रयास में जुट गईं गौरा देवी सहित अन्य महिलाएं पेड़ों को बचाने के लिए उनके साथ चिपक गईं। गौरा देवी के साथ घट्टी देवी, भादी देवी, बिदुली देवी, डूका देवी, बाटी देवी, गौमती देवी, मूसी देवी, नौरती देवी, मालमती देवी, उमा देवी, हरकी देवी, बाली देवी, फगुणी देवी, मंता देवी, फली देवी, चन्द्री देवी, जूठी देवी, रुप्सा देवी, चिलाड़ी देवी, इंद्री देवी आदि ही नहीं बच्चियाँ- पार्वती, मेंथुली, रमोती, बाली, कल्पति, झड़ी और रुद्रा भी थीं।


महिलाओं ने मजदूरों और कारिन्दों से कहा कि खाकर के चले जाओ। कारिन्दों ने डराने धमकाने का प्रयास शुरू कर दिया। महिलाएँ झुकने के लिये तैयार नहीं थीं। डेड़-दो घंटे बाद जब वन विभाग के कारिन्दों ने मजदूरों से कहा कि अब कटान शुरू कर दो। महिलाओं ने पुनः मजदूरों को वापस जाने की सलाह दी। 50 से अधिक कारिन्दों-मजदूरों से गौरा देवी तथा साथियों ने अत्यन्त विनीत स्वर में कहा कि-


"भाइयो यह जंगल हमारा मायका है। पेड़ो ने हमें पूरे जीवन पोषण किया, उन्होंने हमें विपत्तियों से बचाया है। अब हमारी बारी है। इसलिए यदि आप उन्हें काटना चाहते हैं, तो आगे बढ़ें। लेकिन इन पेड़ों को काटने से पहले, आपको अपनी कुल्हाड़ियों से हम सभी को काटना होगा।"



मजदूर असमंजस में थे। पर ठेकेदार और जंगलात के आदमी उन्हें डराने-धमकाने लगे। काम में रुकावट डालने पर गिरफ्तार करने की धमकी के बाद इनमें से एक ने महिलाओं को डराने के लिये बंदूक निकाल ली। महिलाओं में दहशत तो नहीं फैली पर तुरन्त कोई भाव भी प्रकट नहीं हुआ। उन सबके भीतर छुपा रौद्र रूप तब गौरा देवी के मार्फत प्रकट हुआ, जब बन्दूक का निशाना उनकी ओर साधा गया। अपनी छाती खोलकर उन्होंने कहा-


"मारो गोली और काट लो हमारा मायका। हमें गोली मारो और फिर तुम पेडों काट सकते हो सभी महिलाओं ने गौरा देवी के साथ खड़े होकर पेड़ों को काटने की चेतावनी दी और पेड़ों के साथ खुद को भी काटने के लिए कहा"


गौरा की गरजती आवाज सुनकर मजदूरों में भगदड़ मच गई। गौरा को और अधिक बोलने और ललकारने की जरूरत नहीं पड़ी। मजदूर नीचे को खिसकने लगे। मजदूरों की दूसरी टोली, जो राशन लेकर ऊपर को आ रही थी, को भी रोक लिया गया। अन्ततः सभी नीचे चले गये।



इसके बाद महिलाओं ने ऋषिगंगा के किनारे जंगल को जोड़ने वाले एक पुल को उखाड़ दिया ताकि फिर कोई जंगल की ओर न जा सके, और जंगल के हर रास्ते पर पहरा देने लगे। ठेकेदार के आदमियों ने गौरा देवी को फिर डराने-धमकाने की कोशिश की। बल्कि उनके मुँह पर थूक तक दिया लेकिन गौरा देवी के भीतर की माँ उनको नियंत्रित किये थीं। वे चुप रहीं। उसी जगह सब बैठे रहे। धीरे-धीरे सभी नीचे उतर गये।


अगली सुबह रैणी के पुरुष ही नहीं, गोविन्द सिंह रावत, चंडी प्रसाद भट्ट और हयात सिंह भी आ गये। रैणी की महिलाओं का मायका बच गया और प्रतिरोध की सौम्यता और गरिमा भी बनी रही। 27 मार्च 1974 को रैणी में सभा हुई, फिर 31 मार्च को। इस बीच बारी-बारी से जंगल की निगरानी की गई। मजदूरों को समझाया-बुझाया गया।


गौरा देवी और उनके समूह की जीत ने न केवल जंगल को बचाया बल्कि पहले अखिल महिला पर्यावरण संरक्षण आंदोलन को भी जन्म दिया। कुछ समय बाद गौर देवी ने अपने बेटे को परिवार की जिम्मेदारी सौंप दी और अपने क्षेत्र की गरीबी और महिलाओं के जीवन को सुधारने के काम में जुट गई। गौरा देवी ने महिलाओं और प्रकृति की बेहतरी के संबंध में कई अभियानों का नेतृत्व किया।


3 तथा 5 अप्रैल 1974 को भी प्रदर्शन हुए। 6 अप्रैल को डी.एफ.ओ. से वार्ता हुई। 7 तथा 11 अप्रैल को पुनः प्रदर्शन हुए। पूरे तंत्र पर इतना भारी दबाव पड़ा कि मुख्यमंत्री हेमवतीनन्दन बहुगुणा की सरकार ने डॉ. वीरेन्द्र कुमार की अध्यक्षता में रैणी जाँच कमेटी बिठाई और जाँच के बाद रैणी के जंगल के साथ-साथ अलकनन्दा में बायीं ओर से मिलने वाली समस्त नदियों-ऋषिगंगा, पाताल गंगा, गरुण गंगा, विरही और नन्दाकिनी- के जल ग्रहण क्षेत्रों तथा कुँवारी पर्वत के जंगलों की सुरक्षा की बात उभरकर सामने आई और सरकार को इस हेतु निर्णय लेने पड़े। रैंणी सीमान्त के एक चुप गाँव से दुनिया का एक चर्चित गाँव हो गया और गौरा देवी चिपको आन्दोलन और इसमें महिलाओं की निर्णायक भागीदारी की प्रतीक बन गईं।


इस प्रकार से पर्यावरण के प्रति अतुलित प्रेम का प्रदर्शन करने और उसकी रक्षा के लिये अपनी जान को भी ताक पर रखकर गौरा देवी ने जो अनुकरणीय कार्य किया, उसने उन्हें रैंणी गांव की गौरा देवी से चिपको वूमेन फ्राम इण्डिया बना दिया




गौरा देवी के गांव की हालत:


गौरा द्वारा किये गए कामों ने उन्हें महान बना दिया लेकिन जिस गाँव से उनका संबंध था उस गाँव को पिछले दिनों बड़ी तबाही का सामना करना पड़ा 7 फरवरी 2021 को चमोली जिले में ग्लेशियर फटने से यहां का जन जीवन अस्त व्यस्त हो गया था यह ग्लेशियर जिस गाँव के समीप फटा वह गौरा देवी का रैणी गाँव ही था यह गांव चमोली जिले के जोशीमठ ब्लॉक मुख्यालय से 26 किलोमीटर दूर स्थित है बता दें कि इस आपदा से उत्तराखंड के कई इलाकों में भारी क्षति पहुंची थी कई लोगों के मारे जाने के अलावा, कई गांव उजड़ गए रैणी गांव के करीब स्थित ऋषि गंगा पावर प्रोजेक्ट भी तबाह हो गया था प्रोजेक्ट को काफी नुकसान पहुंचने के अलावा इसमें काम करने वाले सैकड़ों लोग भी लापता हो गए थे



4 जुलाई 1996 को 66 वर्ष की आयु में गौरा देवी की मृत्यु हो गई। गौरा देवी का प्रकृति और पर्यावरण के प्रति प्यार समाज के लिये प्रेरणा है। भले ही गौरा देवी आज हमारे बीच ना हों लेकिन उन्होंने जो किया उसे कभी नहीं भुलाया जा सकता लोग आज भी उन्हें चिपको वुमन के नाम से जानते हैं


एक साक्षात्कार में गौरा देवी ने जंगल के प्रति अपना स्नेह दर्शाते हुए कहा था कि ये जंगल हमारी माता के घर जैसा है यहां से हमें फल ,फूल ,सब्जियां मिलती हैं अगर यहां के पेड़-पौधे काटोगे तो निश्चित ही बाढ़ आएगी



1986 में गौरा देवी को "प्रथम वृक्ष मित्र पुरस्कार" से सम्मानित किया गया, और 30 से अधिक महिला समूहों में दशाली ग्राम स्वराज्य मंडल के अध्यक्ष के रूप में चुना गया।



चिपको आन्दोलन’ का घोषवाक्य –

                        “क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार,


                    मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार



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